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कलम की कथनी या किबोर्ड की करनी, किसके शब्दो में है दम?

कलम के युग में स्याही कच्ची, मगर इसकी कथनी सच्ची और पक्की थी। किबोर्ड के युग में शब्द पक्के मगर भाव कच्चे लगते हैं। क्या आपने कभी  चिट्ठियां लिखी हैं? या कभी मां के पास कभी कोई पुरानी रखी  चिट्ठियां पढ़ी है? 

कंप्यूटर का ज़माना आ गया है उंगलियां कीबोर्ड पर ऐसे मचलती हैं कि मानो पैसे गिनने के लिए फड़फड़ा रही हो। मगर इस बीच एक एहसास सा खत्म होता जा रहा है, वह है अपने हाथ से अपनी भावनाओं को लिखने का मज़ा। न जाने क्यों कीबोर्ड से मेरी कुछ ज्यादा बनी नहीं, खासकर तब, जब इमोशंस लिखने की बारी आती है तो मुझे कलम से लिखे हुए, हाथ से संजोए हुए, अपने शब्द ही पसंद आते हैं। चाहे वह बुक मार्कर, हो या अपनी कविताएं लिखना या फिर चंद पंक्तियां लिखना। 

मुझे यकीन है यह बात वह लोग जरूर समझेंगे जिन्होंने कभी चिट्ठियों से अपने दिल की भावनाएं अपनों तक पहुंचाई हो| जिन्होंने कभी कागज पर वह सच लिखा हो जो वह कभी किसी से ना कह पाए हो। यह बात वह लोग जरूर समझेंगे जिन्होंने अपने सुख-दुख के संदेश कभी अपने प्रियजनों को और सगे संबंधियों को चिट्ठियों से भेजे हो।

आज भी मुझे मेरी पुरनी किताबें, मेरे हाथों से लिखे नोटस और कॉपियां मिलती हैं जिनके पिछले पन्नों पर मैंने अपनी सहेलियों के साथ कुछ ना कुछ लिखा था वह मुझे फिर से उन्ही स्कूल के दिनों की याद दिलाती है, मानो मैं वहीं बैठी क्लास में पीछे कुछ शरारत कर रही हूं अपनी टीचर से छिपकर कुछ लिखकर अपनी सहेली को लिख कर कुछ कहना चाह रही हूं, पर क्या आपको अब वही भावनाऐं अपने टाइपड नोट्स में दिखती हैं। 

जब कभी आप अपनी पीडीएफ फाइल या वर्ड डॉक्यूमेंट खोलते हैं तो क्या आपको याद आता है कि आपने वे कब टाइप किए थे? उस वक्त आप क्या कर रहे थे? 

किस बेंच पर बैठे थे? 

या आप कौन सी सहेली के साथ है? 

मैं उन दिनों की बात कर रही हूं जब हम हाथ से फेयरवेल और  फ्रेशर पार्टी के नोट लिखा करते थे और इनविटेशन बनाते  थे। पार्टी पर  अपनों  को हाथ से लिखे हुए कार्ड बना कर देते थे।

हर नए साल पर, दिवाली पर, जन्मदिन पर। अपने पड़ोसियों को  कभी बाजार से खरीद कर तो कभी हाथ से बनाकर कार्ड देते थे। बदले में वह भी हमें कार्ड देते थे, इन कार्ड्स के अंदर कुछ अलग ही संदेश लिखे होते थे। रंग-बिरंगे पेन से हम अपने संदेश लिखते थे। तरह-तरह की शायरियां ढूंढ कर लिखते थे। प्रेम और विश्वास से इनको पढ़ते थे।  इनपर पूरा यकीन करते थे, कि जो लिखा है वह हमारे लिए लिखा है और सामने वाला हमारे बारे में यही सोचता है।

यह कार्ड रिश्तेदारों को पोस्ट करते थे, फिर दीवार पर अलग-अलग डिजाइंस में इन कार्ड्स को टांग देते थे घर की शेल्फ पर भी यह कार्ड सजे  रहते थे। पूरा साल हमें याद रहता था कि यह कार्ड किसने भेजा था और यह भी कि इस साल कार्ड किसने नहीं भेजा,  कार्ड ना भेजने के दो ही कारण माने जाते थे या तो उस इंसान से अब हमारा कुछ खास रिश्ता नहीं रहा या फिर उनके घर में किसी तरह की दुखद घटना हुई हो। 

कागजो पर कलमों से लिखी पुरानी बातों लिखावटों का हमारे मन पर जो छाप आती है वो टाईपड शब्दों में कहां।

किताबों की दुनिया से 

रूचिका सचदेवा 


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