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The Quirky Wallflower and the Silent Bumble Bee by Nazam Riar

किताब: द क्वरकी वॉल फ्लावर एंड साइलेंट बंबलबी लेखिका:  नज़म रिआर  नज़म रिआर जी की किताब "द क्वरकी वॉल फ्लावर एंड साइलेंट बंबल बी"   मुझे  नज़म रिआर जी से तोहफे में मिली है। किताब मेरे बहुत ही अज़ीज दोस्तों वनिता खन्ना व उनके पति जे बी सिंह अटवाल मेरे लिये दोस्ती का फर्ज समझ कर लेखिका से पर्सनल मैसेज लिखवा कर लाये। शायद वे दोनो जानते थे कि मेरे लिये एक औरत और एक इन्सान होने के रूप मे यह एक बेहद अच्छा तोहफा सिद्ध होगा। यह किताब किस बारे में बात करती  है ?  दर्द भरे दिलों की खुद को गमों से उबारने की औरत के सशक्तिकरण की जिन्दगी में प्यार की अहमियत की बाहरी दुनिया में खुशियां ढूंढने की ब्जाय खुद के भीतर खुशियां तलाशने की किताब के कुछ ही पन्ने पढ़ पायी हुं मगर खुश हुं कि मेरे लिये किसी ने ऐसा बेहतरीन तोहफा लिया । 🙏 यह मेरे लिये या औरतों के लिये ही नही, किसी भी व्यक्ति के लिये खास तोहफा हो सकता है जो जिन्दगी में कई सवालों से घिरा है। किताब का पूरा रिवयू जल्द ही सांझा करूंगी। वनिता खन्ना व जे बी सिंह अटवाल ने लेखिका के साथ कुछ पल सांझा किये जिन्हे उन्होन...

क्या जहाज की टिकट में देश बदलने के साथ मानसिकता बदलने की भी कोई अतिरिक्त सेवा दी जाती है?

 देश बदलते ही सोच भी बदल जाती है। एक दिन युं ही गली में खड़े किसी से बात होने लगी कि अब बेटा बेटी बराबर होते है।  आगे से जवाब आया, पर बेटी मां बाप को तो नही रख सकती, मां बाप को तो बेटों ने ही रखना है।  बेटी के घर रहकर बदनामी मोल नही लेनी हमें...  तो मेरे मन में विचार आया बेटी अगर विदेश में कहीं रह रही हो और डिलीवरी के वक्त मां की जरूरत हो। तो मां उसके यहां महीनो पहले पहुंच जाती है। और साल- दो साल बाद ही लौटती है।  उसके कई सारे कारण होते हैं 1. कि पराये देश में अकेली औरत पति के जाने के बाद छोटे बच्चे को कैसे पालेगी? 2. यदि औरत और मर्द दोनो काम पर जाते हैं तो दुधमुहे बच्चे को घर पर अकेला कैसे छोड़कर जाये? 3. जहाज की टिकट इतनी महंगी है कि कई लोगों की महीनो की तनख्वाह लग जाती है एक ओर की टिकट लेने के लिये। इसलिये जल्दी नही आ सकते।  कारण जो भी   हो बेटी के घर में विदेश जाकर इन कारणों के साथ रहना सही है।  और अपने देश में यदि ये कारण ना हो  तो क्या हम बेटी के साथ कुछ महीने या कुछ  वर्ष  रहेंगे? नही... मुझे नही लगता... अपने देश...

आवाम इकट्ठे ही अच्छी...

आवाम इकट्ठे ही अच्छी... आवाम इकट्ठी ही अच्छी, या जयकारों में या ललकारो में | गर ऐसा ना हो, तो समझ लेना... या तानाशाह बैठे सरकारों में, या आवाम है बंद दीवारों में || आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं View this post on Instagram A post shared by Ruchika Sachdeva (@ruchikasachdeva_)

बी माय परफेकट ऐंडिंग किताब की शुरूआत || लेखकः अर्पित वगेरिआ

किताबः बी माय परफेकट ऐंडिंग  लेखकः अर्पित वगेरिआ यू आर दी बेस्ट वाईफ, अजय के पांडे द्वारा लिखी खुबसूरत किताब पढ़ने के बाद मेरा रूझान रोमांटिक नावल की ओर हो गया। सोचा क्युं ना एक और रोमांटिक नावल पढ़ा जाये पर अब किसी और लेखक का।  हालांकि मैने अजय के पांडे के दो और नावल मंगवा लिये हैं पर सोचा पहले किसी और लेखक की लेखनी पढ़ी जाये। इसके लिये मैने चुनी है किताब बी माय परफेकट ऐंडिंग। अर्पित वगेरिआ ने ये किताब लिखी है। किताब पढ़ने की इच्छा यह जानने के बाद और दुगनी हो गयी कि लेखक और कहानी का पात्र दोनो ही एक टेलीविज़न लेखक है। बचपन से घर पर टेलीविजन सिरीयलज़ देखते आये हैं तो नावल से पहले टीवी ही मेरे लिय इंटेरटेनमेंट का पहला माध्यम था।  सोचा शायद यह नावल टीवी स्टारज़ की चकाचैध भरी जिंदगी से जुड़ा होगा। यह किताब शुरूआत में बाम्बे की चकाचैध में जी रहे एक टेलीविज़न के लेखक की जिन्दगी दिखती है जो महत्वाकांशी है। जीवन में सच्चा प्यार तलाशने और अपनी जड़ों को ढूंढने की कोशिश कर रहा है। शुरूआती पन्ने में अरमान  अपनी प्रोफेशनल लाईफ में निराश और उलझा-उलझा सा रहता है। वहीं दूसरी और प्या...

कलयुग के प्रेम में भी है अमर करने की ताकत

You Are The Best Wife by Ajay K Pandey किताब:   यू आर   दी  बेस्ट वाईफ   लेखक:  अजय के पांडे  यह किताब लेखक और उनकी पत्नी की सच्ची कहानी है।              "प्यार आपको धर्म निरपेक्ष बना देता है।"          "L ove makes us secular."           अजय के पांडे की खूबसूरत किताब पूरी करने तक मेरी आंखों में आंसू थे और दिमाग में बहुत से सवाल घूम रहे थे। मेरे मन ने भी भगवान के होने पर कई सवालिया निशान लगा दिए थे। क्या भगवान सच में इतना निर्दयी हो सकता है? जब किसी को हमसे छीनना ही है तो उसे हमारी जिंदगी का हिस्सा क्यों बनाता है? किताब किन लोगों को अधिक पसन्द आ सकती है           यदि आप रोमांच, रोमांस, व्यंगय व स्टीक लेखनी के शौकीन हैं तो ये किताब आपके लिये है। आपको ये किताब सेल्फ इंप्रुवमेंट में भी मदद करेगी। यह किताब आपको बखुबी बतायेगी कि जिन्दगी सुख, दुख और संघर्ष का मिलाजुला नाम है । कहानी           यह...

कलम की कथनी या किबोर्ड की करनी, किसके शब्दो में है दम?

कलम के युग में स्याही कच्ची, मगर इसकी कथनी सच्ची और पक्की थी। किबोर्ड के युग में शब्द पक्के मगर भाव कच्चे लगते हैं। क्या आपने कभी  चिट्ठियां लिखी हैं? या कभी मां के पास कभी कोई पुरानी रखी  चिट्ठियां पढ़ी है?  कंप्यूटर का ज़माना आ गया है उंगलियां कीबोर्ड पर ऐसे मचलती हैं कि मानो पैसे गिनने के लिए फड़फड़ा रही हो। मगर इस बीच एक एहसास सा खत्म होता जा रहा है, वह है अपने हाथ से अपनी भावनाओं को लिखने का मज़ा। न जाने क्यों कीबोर्ड से मेरी कुछ ज्यादा बनी नहीं, खासकर तब, जब इमोशंस लिखने की बारी आती है तो मुझे कलम से लिखे हुए, हाथ से संजोए हुए, अपने शब्द ही पसंद आते हैं। चाहे वह बुक मार्कर, हो या अपनी कविताएं लिखना या फिर चंद पंक्तियां लिखना।  मुझे यकीन है यह बात वह लोग जरूर समझेंगे जिन्होंने कभी चिट्ठियों से अपने दिल की भावनाएं अपनों तक पहुंचाई हो| जिन्होंने कभी कागज पर वह सच लिखा हो जो वह कभी किसी से ना कह पाए हो। यह बात वह लोग जरूर समझेंगे जिन्होंने अपने सुख-दुख के संदेश कभी अपने प्रियजनों को और सगे संबंधियों को चिट्ठियों से भेजे हो। आज भी मुझे मेरी पुरनी किताबें, मेरे हाथों से ल...

मर्द वो जो औरत नही और औरत वो जो मर्द नही

हम जिस पल जन्म लेते हैं उसी पल से हमारा वर्गीकरण शुरू हो जाता है। औरत है या मर्द ? जाति कौन सी है? रंग कैसा है? गरीब है या अमीर?  हम जिस पल जन्म लेते हैं उसी पल से हमारा वर्गीकरण शुरू हो जाता है। औरत है या मर्द ? जाति कौन सी है? रंग कैसा है? गरीब है या अमीर? और ये सब वर्गीकरण अपने आप को बुद्यिमान कहलवाने वाले समाज के ठेकेदार करते हैं। अगर ये भेदवाव सच में कुछ मायने रखता है, तो जाति धर्म के ठेकेदारों से कभी पूछो तो.. कि अछुत मान कर किसी के हाथ का खाना खाने से मना करने वालों ने कभी ये कहा है कि हम अपनी जाति व धर्म द्वारा उगाया अन्न ही खाऐंगे। उन्ही के द्वारा उगायी कपास का बना कपड़ा पहनेंगे। उसी जाति के डाक्टर से ईलाज करवायेंगें। उसी के हाथ का बना जूता पहनेंगे। नही धर्म के ठेकेदारों ने बड़ी चतुराई से लोगों को इस भेदभाव में उलझा दिया ताकि असली मुद्दों पर बातचीत करने से लोग भटक जाये। समय ही निकाल पाये असली मुद्दों पर बात करने का।         ये रंगभेद मज़ाक सा लगता है मुझे। ये मज़ाक नही तो क्या है? रंग के आधार पर सुन्दरता को आंकने वाले से कभी पूछा है कि सफेद रंग को...